सर सैयद अहमद समाज सुधारक कहे गए लेकिन राजा महेंद्र प्रताप सिंह का नाम गायब क्यों?

0
44

[ad_1]

नई दिल्ली: लोकतंत्र सिर्फ आतंकवाद की वजह से ही नहीं बल्कि मिलावटी इतिहास की वजह से भी खतरे में पड़ जाता है. लोकतंत्र की परिभाषा होती है, जनता का, जनता के लिए, जनता शासन. 

भारत के इतिहास में की गई मिलावट

भारत ने अंग्रेजों से मिली आजादी के फौरन बाद ही इस भावना को अपना लिया था. लेकिन अंग्रेज जाते जाते इस भावना में मिलावट कर गए थे. कोई देश लोकतंत्र और आज़ादी के महत्व को तब समझता है, जब उस देश के लोगों को उस देश का असली इतिहास पढ़ाया जाता है. हालांकि अंग्रेजों ने और उसके बाद आजाद भारत में आई सरकारों ने ऐसा नहीं होने दिया. 

इन सरकारों ने मिलावटी इतिहास के इर्ग गिर्द एक नया Eco System तैयार किया. जो था अंग्रेज़ों का, अंग्रजों द्वारा और अंग्रेजों के लिए लिखा गया इतिहास.

छिपा ली गई असली देशभक्तों की कहानी 

आजादी के बाद स्कूलों और कॉलेजों में भारत का जो इतिहास हमें पढ़ाया गया. वो अंग्रेजों ने लिखा था, इसे अंग्रेजी बोलने वाले ही पढ़ाते थे और अंग्रेज़ी बोलने वाले ही समझ पाते थे. इस इतिहास में अकबर द ग्रेट के लिए तो जगह थी..लेकिन अशोक द ग्रेट के लिए जगह नहीं थी. इस इतिहास में सर सैयद अली खान को तो एक समाज सुधारक की तरह पेश किया गया. लेकिन राजा महेंद्र प्रताप सिंह (Raja Mahendra Pratap Singh) जैसे देशभक्तों की कहानी छिपा ली गई .

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्व विद्यालय का शिलान्यास किया, वैसे ही राजा महेंद्र सिंह की चर्चा पूरे देश में होने लगी. राजा महेंद्र प्रताप सिंह जीवन भर भारत को अंग्रेज़ों से आज़ाद कराने के लिए लड़े. वो पहले ऐसे भारतीय थे, जिन्होंने वर्ष 1915 में अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारत की पहली निर्वासित सरकार का गठन किया था. जिसका नाम था हुकूमत ए मुख्तार ए हिंद यानी आज़ाद भारत की आज़ाद सरकार.

जबकि जवाहर लाल नेहरू जैसे नेताओं ने पहली बार वर्ष 1929 में पूर्ण आज़ादी की मांग रखी थी. इससे पहले कांग्रेस इस बात के लिए भी तैयार थी कि अंग्रेज़ भारत को इस शर्त के साथ आज़ाद कर दें कि भारत और भारत के लोग जीवन भर ब्रिटेन की महारानी को अपनी महारानी मानते रहेंगे. यानी अगर इन नेताओं की चल जाती तो भारत आज़ाद तो हो जाता लेकिन भारत के लिए सारे फैसले आज भी अंग्रेज़ ही ले रहे होते.

अलीगढ़ के राजघराने में राजा महेंद्र प्रताप का जन्म

राजा महेंद्र प्रताप सिंह (Raja Mahendra Pratap Singh) ने इन नेताओं की पूर्ण स्वराज की मांग से 14 वर्ष पहले ही भारत को एक आजाद देश घोषित कर दिया था. उन्होंने काबुल में अपने नेतृत्व में एक निर्वासित सरकार का गठन भी कर दिया था. अलीगढ़ में प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस बात का जिक्र किया और कहा कि ये देश का दुर्भाग्य है कि आज़ादी के बाद भारत के ऐसे राष्ट्र नायकों और राष्ट्र नायिकाओं को भूला दिया गया.

राजा महेंद्र प्रताप सिंह का जन्म 1 दिसंबर 1886 को अलीगढ़ के मुरसान राजघराने में हुआ था. कहा जाता है कि उन्हें हाथरस के राजा हर नारायण सिंह ने गोद ले लिया था और उन्हें अपना वारिस घोषित कर दिया था.

वर्ष 1914 में राजा महेंद्र प्रताप सिंह जब सिर्फ 28 साल के थे.तब वो भारत से बाहर चले गए थे. वो चाहते थे कि वो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ दुनिया के अलग अलग देशों का समर्थन हासिल करे. इसके अगले वर्ष यानी 1915 में वो स्विटज़रलैंड, जर्मनी, विएना और टर्की से भारत की आज़ादी का समर्थन हासिल करके काबुल पहुंचे. वहां उन्होंने भारत की पहली निर्वासित सरकार का गठन किया.

उन्होंने इसके लिए काबुल का चयन इसलिए किया था क्योंकि ये भौगोलिक रूप से एक महत्वपूर्ण जगह थी. तब भारत की सीमाएं अफगानिस्तान से मिला करती थी. भौगोलिक रूप से अफगानिस्तान चीन के भी करीब है. अफगानिस्तान की सीमाएं उस समय के Russia से भी मिलती थी और अफगानिस्तान टर्की के भी बहुत करीब है. टर्की और Russia के रास्ते यूरोप जाना आसान था. महेंद्र प्रताप सिंह इन देशों के साथ साथ यूरोप के कुछ देशों और अमेरिका का भी समर्थन हासिल करना चाहते थे.

राष्ट्रवादी राजा से डर गई थी ब्रिटिश सरकार

उनकी इस कोशिश से ब्रिटिश सरकार इतना डर गई थी कि उसने ऐलान कर दिया था कि जो भी राजा महेंद्र प्रताप सिंह (Raja Mahendra Pratap Singh) के बारे में बताएगा या उन्हें जिंदा या मुर्दा पकडेगा, उसे इनाम दिया जाएगा. शायद बहुत कम लोगों को महेंद्र प्रताप सिंह के बारे में ये सारी बातें पता होंगी. बहुत कम लोगों को ही इसकी जानकारी होगी कि महेंद्र प्रताप सिंह ने ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी यानी AMU को अपनी निजी जमीन दान में दी थी.

आज भारत के लोग AMU की स्थापना करने वाले सर सैयद अहमद खान के बारे में तो जानते हैं. जिन्हें ब्रिटेन की सरकार ने Order Of The Star Of India पुरस्कार से सम्मानित किया था और जिन्हें Sir की उपाधि भी थी. यहीं से भारत में पुरस्कार गैंग की शुरुआत हुई थी. सैयद अहमद खान ने ही 1888 में मेरठ में एक भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि हिंदू और मुसलमान कभी एक साथ नहीं रह सकते. अगर अंग्रेज़ भारत से चले गए तो हिंदू मुसलमानों को दबाने की कोशिश करेंगे.

भारत के लोग राजा महेंद्र प्रताप सिंह के बारे में नहीं जानते. जिनसे अंग्रेजों की सरकार खौफ खाती थी. राजा महेंद्र सिंह वर्ष 1914 में भारत से बाहर गए थे. उसी समय पहले विश्वयुद्ध की शुरुआत हुई थी, जो वर्ष 1919 तक चला था. पहले विश्वयुद्ध के बाद से ही ब्रिटेन कमज़ोर होने लगा था. इसलिए राजा महेंद्र प्रताप सिंह को लगा कि वो दुनिया के कई देशों को भारत की आज़ादी के पक्ष में ला पाएंगे. 

ब्रिटेन पर दबाव डाला जाता तो शायद भारत को पहले विश्वयुद्ध के दौरान ही आज़ादी मिल जाती. तब भारत के ही कुछ नेताओं ने तर्क दिया कि ऐसे समय में अंग्रेज़ों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए. इन नेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए ना सिर्फ भारत की आज़ादी को टाला बल्कि भारत के लाखों युवाओं को अंग्रेज़ों की तरफ से पहले विश्व युद्ध में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया. अंग्रेजों के लिए लड़ते हुए पहले विश्वयुद्ध में भारत के एक लाख सैनिकों ने अपनी जान गंवाई थी.

जबकि राजा महेंद्र प्रताप सिंह (Raja Mahendra Pratap Singh) जैसे देश भक्त चाहते थे कि कमजोर हो चुकी ब्रिटिश हुकूमत को जड़ से उखाड़कर फेंक दिया जाए. लेकिन तब भारत के कुछ स्वार्थी नेता ऐसा नहीं चाहते थे.

राजा के नाम पर यूनिवर्सिटी के मायने

राजा महेंद्र प्रताप सिंह जाट समुदाय से थे. इसलिए अलीगढ़ में उनके नाम पर यूनिवर्सिटी का शिलान्यास कई मायनों में अहम है. उत्तर प्रदेश में जाट समुदाय की कुल आबादी तो सिर्फ़ 6 प्रतिशत के आसपास है. ये 6 प्रतिशत लोग पश्चिमी यूपी के 19 ज़िलों की 90 विधान सभा सीटों पर सीधे तौर पर प्रभावशाली माने जाते हैं. 

बड़ी बात ये है कि किसान आन्दोलन का ज़्यादा असर पश्चिमी यूपी के इन्हीं ज़िलों में है. अब अगर बीजेपी जाट समुदाय का विश्वास जीतने में कामयाब रही तो उसे चुनाव में काफ़ी फायदा हो सकता है.

हालांकि जो लोग महेंद्र प्रताप सिंह को जाति धर्म से जोड़ रहे हैं. उन्हें पता होना चाहिए कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह एक हिंदू परिवार में पैदा हुए थे. उन्होंने मुस्लिमों के कॉलेज से शिक्षा हासिल की और उनका विवाह राजकुमारी बलबीर कौर से हुआ था. जो एक सिख थीं .

एक समय में महेंद्र प्रताप सिंह ने अपना नाम बदलकर पीटर पीर प्रताप रख लिया था. वो हिंदु, मुस्लिम और ईसाइयों की एकता के पक्ष में थे और यही संदेश देने के लिए उन्होंने अपना नाम बदल लिया था.

भारत का इतिहास अंग्रेज़ों की छवि फायदा पहुंचाने के लिए लिखा गया था आज़ादी के बाद. इसी इतिहास के दम पर उन लोगों ने अपनी छवि को फायदा पहुंचाया, जो अंग्रेज़ी में पढ़ते थे, अंग्रेज़ी में बोलते थे और भारत के हितों के बारे में भी अंग्रेजी में ही सोचते थे.

इतिहास में मुगलों की शान में कशीदे

इसीलिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले राजा महेंद्र प्रताप सिंह (Raja Mahendra Pratap Singh), East India Company के खिलाफ लड़ने वाली शिवगंगा साम्राज्य की महारानी वेलु नेचियार, महमूद गजनवी के भांजे गाजी सैयद सलार को हराने वाले श्रावस्ती के राजा सुहेल देव और उन मराठा योद्धाओं के बारे में नहीं बताया जाता. जिन्होंने ना सिर्फ मुगलों को हराया था बल्कि अपने साम्राज्य का विस्तार पेशावर तक कर लिया था, जो आज पाकिस्तान में है. जबकि बाबर, हुमायुं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब जैसे क्रूर शासकों की शान में कसीदे गढ़े गए.

सिखों के नौवें गुरू गुरू तेग बहादुर की हत्या औरंगज़ेब ने सिर्फ इसलिए करा दी थी क्योंकि वो कश्मीरी हिंदुओं का जबरदस्ती धर्म परिवर्तन किए जाने का विरोध कर रहे थे. जिस जगह पर औरंगज़ेब के आदेश पर गुरू तेग बहादुर का सिर काटा गया था. वहीं अब सीस गंज गुरुद्वारा है.

अफसोस देखिए कि आजादी के बाद सीस गंज गुरू द्वारे से सिर्फ 10 किलोमीटर दूर औरंगज़ेब के नाम पर ही एक सड़क बना दी गई. जिसका नाम वर्ष 2015 में बदलकर पूर्व राष्ट्रपति APJ अब्दुल कलाम के नाम पर रखा गया. आज़ादी के 68 वर्ष बीत जाने के बाद भी किसी ने इस सड़क का नाम बदलने की कोशिश नहीं की क्योकि ये दरबारी इतिहासकारों को सूट नहीं करता था. 

मुगलों के अत्याचारों को सफाई से छिपाया गया

सिख गुरुओं का कत्ल करने वाले क्रूर शासकों को हमारे इतिहास में महान बताकर पेश किया गया. वहीं उनके खिलाफ लड़ने वाले वीरों और वीरांगनाओं के नाम इतिहास की किताबों में नहीं बताए जाते. मुगलों की ओर से बनाए गए महलों, किलों, मकबरों और यहां तक की बगीचों की भी तारीफ इतिहास की किताबों में की गई. लेकिन किसी ने आपको ये नहीं बताया कि इन्होंने कितने हिंदू मंदिरों को तोड़ दिया था.

हमें ये तो बताया जाता है कि देश की राजधानी दिल्ली में मौजूद कुतुब मीनार कितनी शानदार कलाकृति है. कैसे इसका निर्माण बाहर से आए आक्रमणकारियों की दूरदर्शी सोच का नतीजा था. लेकिन ये नहीं बताया जाता कि जिस जगह पर कुतुब मीनार है, वहां कभी 27 हिंदू और जैन मंदिर हुआ करते थे. फिर मंदिरों की इस जमीन पर कुतुब मीनार खड़ी कर दी गई.

अंग्रेज और वामपंथी इतिहासकार ने तो ये भी साबित करने की कोशिश की कि संस्कृत भाषा और वैदिक संस्कृति को विदेशी भारत में लेकर आए थे. जिन्हें आर्यन कहा जाता है. हालांकि कई Studies में ये साबित हो चुका है कि भारत में आर्यों के आने की कहानी मनगढ़ंत है और इसके कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं.

वामपंथी इतिहासकारों ने बताया कि सरस्वती नदी सिर्फ पौराणिक कल्पना है और इसका असल में कोई अस्तित्व नहीं है. जबकि इसका जिक्र ऋगवेद में कई जगह आता है और हाल ही में हुई कई Studies भी ये दावा करती है कि हिमालय से निकलकर सरस्वती नदी अरब सागर तक बहती थी.

भारत की महान संस्कृति पर साधी गई चुप्पी

दरबारी इतिहासकारों ने तो अयोध्या में राम मंदिर के इतिहास को भी नकार दिया था. सबसे बड़ा झूठ तो ये बोला गया कि भारत को एक करने वाले मुगल थे. जबकि सच ये है कि गुप्ता, मौर्य, और मराठा राजाओं का साम्राज्य भारत के बाहर तक भी फैला हुआ था. इन राजाओं ने सही मायनों में भारत को उसकी संस्कृति के दम पर एक किया था.

इस मिलावटी इतिहास को लोगों के दिमाग में बैठाने के लिए कई तरीक़े अपनाए गए. इनमें से एक था, जिन अस्पताल में आप जन्म लेते हैं, जिन स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं, जिस सड़क का इस्तेमाल करते हैं, जिस हवाई अड्डे से सफ़र करते हैं और जिस संग्रहालय में इतिहास का स्मरण करने जाते हैं, उनका नाम मुगल शासकों, अंग्रेज़ों और गांधी नेहरू परिवार के नाम पर रख देना.

मौजूदा समय में भारत में ऐसे जिलों, कस्बों और गांवों की संख्या 700 से ज़्यादा है, जिनके नाम मुगल शासकों के नाम पर हैं. इनमें 61 जगहों के नाम पहले मुग़ल शासक जहीरुद्दीन मोहम्मद उर्फ बाबर के नाम पर हैं. बाबर ने अपने शासन में हिन्दुओं का नरसंहार ही नहीं किया बल्कि अनेक हिन्दू मंदिरों को भी नष्ट किया. इनमें अयोध्या का राम मन्दिर भी था. 

मुगलों के नाम बच्चों का नामकरण करते हैं कुछ लोग

मुग़ल शासक हुमायूं के नाम पर 11 जगहों के नाम हैं. दिल्ली में हुमायूंपुर नाम की जगह देश की संसद से सिर्फ़ 8 किलोमीटर दूर है. अकबर के नाम पर सबसे ज्यादा 251 जगहों के नाम हैं. मुगल शासक जहांगीर के नाम पर 141 जगहों के नाम हैं. जहांगीर के ही आदेश पर सिखों के पांचवें गुरु अर्जनदेव की वर्ष 1606 में हत्या की गई थी. आज हमारे देश के कुछ खास लोग अपने बच्चों का नाम जहांगीर रख कर ये बताने की कोशिश करते हैं कि जहांगीर इस देश के लिए हीरो है.

शाहजहां के नाम पर भी हमारे देश में 63 जगहों का नाम है. औरंगज़ेब के नाम पर 177 जगहों के नाम हैं. औरंगजेब ने ही काशी और मथुरा में मन्दिर तुड़वा कर मस्जिदें बनवाई थीं. हिन्दुओं पर जजिया कर भी लगाया था, जिसे ना चुकाने पर हिन्दू महिलाओं पर जुल्म होते थे. इसके बावजूद ये सब आपने इतिहास में नहीं पढ़ा होगा. हमारे देश में लोगों को उतना ही इतिहास बताया गया, जितना नेताओं ने ज़रूरी समझा. पहले सड़कों, ज़िलों और गांवों को मुगल शासकों का नाम दिया गया. फिर बाकी जगहों का नाम गांधी- नेहरु परिवार के नाम पर रख दिया गया.

वर्ष 2015 में एक RTI के माध्यम से पता चला था कि देशभर में 64 सरकारी योजनाएं, 28 Sports Tournaments और Trophies, 23 स्टेडियम, 5 एयरपोर्ट और बंदरगाह, 98 शैक्षिक संस्थान, 51 अलग अलग पुरस्कार, 15 Fellowship, 39 अस्पताल और लगभग 100 सड़कों के नाम गांधी- नेहरु परिवार के नाम पर हैं. अगर इन सबको मिला दें तो ये संख्या 450 होती है.

दरबारी इतिहासकारों ने भारत की आज़ादी में सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभ भाई पटेल, वीर सावरकर और डॉक्टर भीम राव अंबेडकर की भूमिका को भी कम करके आंका. जबकि आजादी के बाद आई सरकारें आज भी डॉक्टर अंबेडकर के नाम पर वोट मांगती हैं.

लोगों के मन में गांधी-नेहरू का नाम बैठाया गया

राजा महेंद्र प्रताप सिंह की तरह नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने वर्ष 1943 में सिंगापुर में भारत की निर्वासित सरकार का गठन किया था और उसी साल अंडमान निकोबार में भारत का तिरंगा फहरा दिया था. अब आप खुद सोचिए इतिहास की किताबों में क्या नेता जी का नाम भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर पर दर्ज नहीं होना चाहिए?

आज अगर कोई छात्र इतिहास की परीक्षा में भारत के पहले प्रधानमंत्री के तौर पर सुभाष चंद्र बोस का नाम लिख दे तो सोचिए क्या होगा. वो छात्र पक्का फेल हो जाएगा. इसी तरह भारत के लोगों के मन में ये बात डाली गई कि अगर आपने हर बात पर नेहरू का नाम नहीं लिया तो परीक्षा में ही नहीं बल्कि जीवन में भी फेल हो जाएंगे.

डॉक्टर भीम राम अंबेडकर को आज़ादी के 40 वर्षों के बाद और सरदार पटेल को आजादी के 41 वर्षों के बाद भारत रत्न दिया गया था.

इसके विपरीत पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और उनकी पुत्री इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री रहते हुए ही भारत रत्न मिल गया था जबकि इंदिरा गांधी के पुत्र राजीव गांधी को उनकी मृत्यु के कुछ महीनों बाद ही भारत रत्न दे दिया गया था.

भारत के लोगों के मस्तिष्क में पहले मुगलों की सल्तनत बसाई गई. फिर एक ही परिवार के कुछ लोगों ने भारत के घर घर में अपनी छाप छोड़ने की कोशिश की. नतीजा ये हुआ कि आज भी भारत में कुछ लोग भारत पर आक्रमण करने वालों को क्रूर शासक नहीं मानते. उनके नाम पर अपने बच्चों का नाम रखना अपनी शान समझते हैं.

लोगों से छिपा ली गई इतिहास की सच्चाई

जर्मनी में कोई अपने बच्चों का नाम हिटलर नहीं रखता. इटली में कोई अपने बच्चों का नाम मुसोलिनी नहीं रखता. वहीं भारत में लोग बड़े आराम से अपने बच्चों का नाम जहांगीर, औरंगज़ेब, अकबर और तैमूर के नाम पर रख लेते हैं. ऐसा करने वालों में बड़े बड़े फिल्म स्टार्स तक शामिल हैं. 

इन लोगों की फिल्में देखने हिंदू भी जाते हैं और सिख भी जाते हैं. फिर भी किसी को इस पर आपत्ति नहीं होती. इसकी वजह ये है कि जहरीले और गुलामी भरे इतिहास को हमारे देश के लोगों के मन और मस्तिष्क में किसी शानदार कलाकृति की तरह स्थापित कर दिया गया है. लोग ये समझ नहीं पाते कि झूठे इतिहास के इस संगमरमर के नीचे कितनी कालिख छिपी है.

LIVE TV



[ad_2]

Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here